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बहारें फिर भी आती हैं

Posted On: 17 Jul, 2011 Others में

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उठो. उठो भी यार. पूजा की शादी में नहीं चलना क्या! वैभव ने मुझे हिला कर रख दिया था। जगाने की उसकी तमाम कोशिशें विफल हो चुकी थीं, किन्तु जैसे ही पूजा की शादी याद दिलाई गयी, मानो नींद उडन-छू सी हो गयी। झटके से उठा और तैयार होने लगा।
तैयार होते-होते सब कुछ मानो फ्लैश बैक में चल रहा था। वही पूजा जो सबसे ज्यादा चहकती घूमती थी। कोई पर्व, त्योहार तो मानो उसके माध्यम से ही हमें पता चलते थे। हम सब काम में डूबे होते और वह अचानक सबको याद दिला देती, आज तो होली है। रंग लगाकर नहीं, हाथ आगे बढाकर होली का खर्चा मागते हुए। मेरे पास आती, तो यह कहना नहीं भूलती, सर आपसे तो सौ रुपये से कम नहीं लूंगी. सुबह मम्मा से भी सौ वसूले हैं। मां के प्रति उसके समर्पण से प्रभावित होकर या फिर फाइनली उसे पैसे तो देने ही पडेंगे, यह सोचकर मेरी जेब से सौ का एक नोट निकल ही जाता। पूरे ऑफिस से पैसे इकट्ठे कर वहीं होती ग्रैंड गाला पार्टी और हा, यह ग्रैंड गाला शब्द उसी का दिया हुआ था, जिसमें धमाल भी था, उल्लास भी और आखिरी में कपडों में भरा रंग भी कि एक दिन पहले ही होली का हुलास समझ में आ जाए। आज उसी पूजा की शादी है, जिसे एक पंक्ति में परिभाषित करना हो तो चंचल, शोख, मां की लाडली और मां के लिए दीवानी पूजा के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता था।
.और फिर याद आ गया वह दिन जब पूजा ने बताया था, सर मेरी शादी तय हो गयी है। आज भी वह हमेशा की तरह उतावली सी थी। हर किसी को अपनी जिंदगी के नए अध्याय में प्रवेश करने के लिए अपने साथ ले जाने को आतुर। उसका उतावलापन ही था, कि उधर शादी तय हुई होगी और इधर उसने फिर आयोजित कर दी थी, अपनी ग्रैंड गाला पार्टी।
एक सप्ताह बाद उसकी इंगेजमेंट थी और पति के विदेश में होने के कारण एक महीने के अंदर ही उसकी शादी के सभी फंक्शन होने थे। शाम को ही वह मेरे पास आयी, सर, मुझे छु्ट्टी चाहिए, मम्मा के साथ ढेर सारी शॉपिग जो करनी है। वह छुट्टी पर तो चली गयी लेकिन फिर जो कुछ हुआ, उसे मैं क्या कोई नहीं भूल सकता।
उस दिन दोपहर में पूजा पूरी तरह तैयार होकर स्कूटी पर मां को बिठाकर शादी का लहंगा खरीदने निकली थी। अब वह कोई आम लडकी तो थी नहीं, पूजा थी, जिसका लहंगा भी स्पेशल ही होना था। पूरी पांच दुकानें देखने के बाद पसंद आया था, उसे अपना लहंगा। मां उसके लहंगे का डिब्बा पकडकर स्कूटी पर पीछे बैठ गयीं और दोनों घर की ओर चल दीं। रात के साढे आठ बज चुके थे, घर से बार-बार फोन आ रहा था और इस रेलवे क्रासिंग को भी अभी ही बंद होना था। क्रासिंग बंद होने पर वह रुकी तो मा उतरीं और जल्दी में फाटक पार करने लगीं। उन्हें ध्यान ही नहीं था कि दूसरी ओर से धडधडाती हुए ट्रेन आ रही है। वह चीखी, रुको मम्मा, रुको. मम्मा.!!, लेकिन शायद ट्रेन की घडघडाहट व अन्य वाहनों के हार्न की आवाज में पूजा की चीखें दब गयीं। ट्रेन गुजर जाने के बाद जब उसे मां नहीं दिखीं तो वह परेशान हो उठी। वह चीखने लगी, कोई मेरी मां को ढूंढो, हाय मम्मा कहा गयीं! लेकिन शायद हर किसी को अपने घर पहुंचने की जल्दी थी, इसीलिए किसी को उसकी आवाज नहीं सुनाई दी।
कुछ पल बाद जब वाहनों का भेडिया धसान कुछ कम हुआ तो उसने देखा कि उसकी मां थोडी दूर पर पटरी के उस किनारे पडी हैं। और उसका लहंगा छिटक कर ग्टि्टी में पडा है। पास में पडा है खुला डिब्बा और उससे झांक रहा है वह चटख पल्लू, जिसे उसके सिर पर रखकर मां ने ढेरों बलैया ली थीं। वह पागलों की तरह दौड कर मां के पास पहुंची। उसने देखा, मां के सिर से खून निकल रहा था। वह बेहोश थीं। तब तक उनके इर्द गिर्द लोग इकट्ठे होने लगे थे। फटी-फटी आंखों से वह देख रही थी कि लहंगे और मां के खून के रंग में कोई अंतर नहीं था। वह फूट फूट कर रोने लगी। वहा से निकल रहे कार, स्कूटर, ऑटो वालों को रोक-रोक कर कहती, प्लीज मेरी मां को अस्पताल ले चलो, लेकिन कोई नहीं रुका। वह चीख रही थी, कोई मेरी मां को बचा लो, प्लीज इन्हें अस्पताल ले चलो, ये मर.प्लीज, कोई तो रुको। वाहनों की लाइट्स के बीच मां की जान बचाने को वह यूं ही बदहवास चीख रही थी, मगर किसी की भी संवेदनाएं नहीं ठहरीं। वह हाथ जोड कर गुहार कर रही थी, लेकिन गाडियां बढती जा रही थीं। कुछ संवेदनशील पैदल लोग जरूर हमदर्दी से देख रहे थे। लेकिन वाहन वालों को अपने घर जाने की जल्दी थी। ऐसे में किसी को एक घर बिखरने की परवाह कहा थी। कोई मरे या जिये उनको क्या।
काफी देर बाद पूजा एक टेंपो से लटक सी गयी, तब ड्राइवर को तरस आया। वह उसे व उसकी मां को लेकर अस्पताल तक छोड गया, किंतु तब तक वे दम तोड चुकी थीं। इसके बाद तो पूजा को मानो कुछ समझ ही नहीं आ रहा था।
उसने रोते-बिलखते हुए जेब से मोबाइल निकाला, पापा को फोन किया और बस इतना ही कहा, जल्दी अस्पताल आइये। पापा भागे-भागे आए और वहा की स्थितियां देखकर खुद को संभाल नहीं सके। पापा पछाड खाकर गिरे तो मानो पूजा अचानक कुछ बडी हो गयी। कुछ देर पहले तक जिस पूजा को संभालना मुश्किल हो रहा था, अब वह पापा को संभाल रही थी। दुर्घटना होने के कारण मां का शव तो पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया, वह पापा को लेकर घर पहुंची। पीछे से कोई पुलिस वाला उसकी स्कूटी और लहंगे का डिब्बा घर छोड गया था। अब बार-बार वही लहंगा उसे मां के सिर से बह रहे खून की याद दिला रहा था।
दूसरे दिन खबर मिलने पर मैं पहुंचा तो आसुओं से सराबोर उसके मुंह से यही निकला, मैंने अपनी मां को अपने सामने बिछुडते देखा है और महसूस की है, इस दुनिया की निरंकुश संवेदनहीनता। पंद्रह दिन बाद मैं फिर उसके घर गया और उसे दुबारा दफ्तर ज्वाइन करने की सलाह दी।
वह दफ्तर तो आने लगी लेकिन अब जैसे वह शोख और चंचल पूजा कहीं खो गई थी। उसकी जगह ले ली थी, एक धीर गंभीर, सूनी आखों वाली लडकी ने, जिसे बाहरी दुनिया में कोई दिलचस्पी नहीं रह गयी थी। उसकी पार्टियों और उत्साह भरी गतिविधियों की तो बस यादें ही रह गयी थीं। इस बीच घर वालों ने उससे शादी की बात की तो उसने साफ इनकार कर दिया। वह दफ्तर आती, काम करती और चुपचाप लौट जाती। घर वाले, रिश्तेदार और कभी-कभी मेरे जैसे उसके कुछ सहकर्मी समझाते तो उसका मौन हमारी बातों पर भारी पड जाता। हंा, इतना जरूर था कि धीरे-धीरे उसे लगा गहरा जख्म भर सा रहा है।
डेढ साल बाद उसके पिता और परिजनों के भागीरथ प्रयास सफल हुए और वह फिर दुल्हन बनने को तैयार हो गयी। हमें लगा, जैसे छाती से कोई भारी पत्थर हट गया। ऐसे में आज उसी पूजा की शादी में न जाऊं, यह कैसे हो सकता है। शादी में भी कुछ जल्दी पहुंच गया तो उसकी बहन मिली। कुछ देर बाद वह सुर्ख लाल लहंगे में सजी हुई, हाथों में जयमाल लिए धीरे-धीरे आगे बढी तो बगल में बैठी दो महिलाओं की खुसुर-पुसुर सुनाई दी। एक महिला दूसरी से कह रही थी. बहुत कम होता है ऐसा, लडके ने डेढ साल तक इंतजार किया और पूजा ने वही लहंगा पहना जो मा उसे दिलवाकर लायी थी। उस लहंगे ने सिर्फ मुझे ही नहीं, मानो सबको एक बार फिर पूजा की मा की याद दिला दी और याद दिलाया मा के प्रति उसका प्यार, उसका समर्पण। मैं पूजा से मिला, उसे शुभकामनाएं दीं और यह सोचता हुआ लौटा. यही है जिंदगी. जो तमाम चुनौतियों के बावजूद नहीं रुकती।

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21 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yamunapathak के द्वारा
July 15, 2012

यह घटना शब्द चित्र बनाती चली गयी.सुखान्त है और आरम्भ से अंत तक अपने प्रवाह में हमें बहा ले गयी. इतनी अच्छी रचना है की तारीफ़ के लिए हर शब्द अधूरे पड़ जाएंगे. साभार

cb Singh के द्वारा
January 30, 2012

बहुत खूब कहा है | http://www.hindisahitya.org पर अपनी कवितायें प्रकाशित करें |

Apporrypype के द्वारा
October 26, 2011

रोचक जानकारी के लिए धन्यवाद

vijay kumar singh के द्वारा
August 21, 2011

संजीव जी आपकी प्रस्तुति पसंद आयी. मेरा मानना है – जिंदगी पूजा है – कोई भी परिस्थिति हो साधक पूजा करता है अर्थात पूजा ने शादी की, जिंदगी पूजी जाती है – कर्मों द्वारा माँ ने क्रेस्सिंग नियमों का उल्लंघन किया जिंदगी ने साथ छोड़ दिया, जिंदगी की पूजा करनी चाहिए – पूजा को पुनः अपने सोंख चंचल स्वाभाव में वापिस आना चाहिए

    Dr. Sanjiv Mishra, Jagran के द्वारा
    August 21, 2011

    बहुत बहुत धन्यवाद विजय जी

sadhana thakur के द्वारा
August 20, 2011

संजीव जी ,,,,बहुत ही मर्मस्पर्सी रचना ………..बहुत अच्छी कहानी ………..

डा. अभिषेक सिंह के द्वारा
August 1, 2011

बहुत सुंदर रचना भाई साहब

K.K.Narain के द्वारा
July 19, 2011

Excellent.

nishamittal के द्वारा
July 18, 2011

मान्यवर आपकी कहानी हृदयस्पर्शी है.बहुत अच्छी

संदीप कौशिक के द्वारा
July 18, 2011

डॉ संजीव मिश्रा जी, दिल को छू लेने वाली कृति !! मंच पर साझा करने के लिए आभार आपका !! http://sandeepkaushik.jagranjunction.com/

    Dr. Sanjiv Mishra, Jagran के द्वारा
    July 18, 2011

    धन्यवाद संदीप जी,  आपका हर शब्द मनोबल बढ़ाने वाला है। 

bhawana shukla के द्वारा
July 18, 2011

sir, very touching story..gr8

ankur dixit के द्वारा
July 17, 2011

already read tht in newspaper sir..i must say…one of d best story ihv evr read….thnkss 4 sharing here….!!!

    Dr. Sanjiv Mishra, Jagran के द्वारा
    July 17, 2011

    धन्यवाद अंकुर भाई….आपके विचार मनोबल बढ़ाने वाले है… आगे और भी अच्छा लिखने की कोशिश करूंगा। 

shakshi dwivedi के द्वारा
July 17, 2011

seriously sir such a wonderful story no words to express….sir u really deserves d credit 4 dis story….))

    Dr. Sanjiv Mishra, Jagran के द्वारा
    July 17, 2011

    धन्यवाद साक्षी जी,  लेखक की कोशिशों को आप जैसे सुधी पाठक ही और लिखने की प्रेरणा देते हैं।


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