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मौत के मायने

Posted On: 19 Nov, 2010 Others में

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कैसी होती है मौत। तमाम बार यह सवाल हम सबके मन में जरूर आता है। बदलते सामाजिक परिवेश में मौत के मायने भी लगातार बदल रहे हैं। जिस तरह छात्र-छात्राएं आत्महत्याएं कर लेते हैं, उससे यह सवाल और जटिल हो जाता है। कुछ भी हो, मौत इतनी आसान तो नहीं होती होगी, फिर भी क्यों मौत को चुन लेते हैं छात्र-छात्राएं। तीन दिन पूर्व आईआईटी कानपुर की छात्रा माधुरी की मौत के बाद एक बार फिर यही सवाल उठे हैं। आईआईटी में प्रवेश का मतलब ही होता है, एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी यानी विलक्षण। अब अपने सामान्य प्रतिस्पर्द्धी वातावरण में सबसे खास होने के बाद आईआईटी पहुँच कर ऐसा क्या हो जाता है, जो छात्र-छात्राएं जिंदगी से हार मान लेते हैं। बीते दो वर्षों में पांच मौतों के बाद आईआईटी के लिए भी यह चुनौती बन गया है। छात्र- छात्राओं की आत्महत्या को लेकर परेशान आइआइटी परिसर में एक सवाल गूंजने लगा है कि आखिर ऐसा क्या है कि तमाम इंतजामों के बावजूद घटनाएं रुकने का नाम नहीं ले रही हैं। हालांकि किसी के पास इसका सही जवाब नहीं, लेकिन छात्रों, शिक्षकों और पूर्व छात्रों से वार्ता के बाद यह तथ्य सामने आया है कि गुरु-शिष्य परंपरा का ह्रास भी इन स्थितियों की बड़ी वजह है। हालात ये हैं कि तमाम शिक्षक, छात्रों का दुख-दर्द संवेदना के साथ नहीं सुनते। उनके और छात्रों के बीच दूरियां बढ़ी हैं और छात्रों में स्वअनुशासन घटा है। शिक्षकों का कहना है कि वे छात्रों की घटती सहनशक्ति, उनके देर रात तक इंटरनेट तथा डीवीडी देखने से नाराज रहते हैं। कोचिंग के बल पर चयनित हुए छात्र 11वीं कक्षा से ही घरों से दूर हो जाते हैं जिससे उनका चिंतन एकांगी हो जाता है। पहले कक्षा में 50 से 60 छात्र होते थे अब सौ से भी ज्यादा हैं। जहां छात्र नेट पर जानकारियों खंगाल लेने से शिक्षकों तक कम पहुंचते हैं वहीं बढ़ी छात्र संख्या के चलते शिक्षक उनके बहुत करीब नहीं पहुंच पाते। वहीं छात्रों का कहना है कि तमाम शिक्षकों को उत्पीड़न करने में आनंद आता है। शिकायत ले जाने पर उल्टे उन्हें ही डांटा जाता है। फैसलों में पक्षपात करते हैं। अपने शोध के काम लेते हैं। मामलों पर काउंसलिंग सेल प्राय: अपेक्षित गंभीरता नहीं बरतता। छात्रावासों के भोजन का स्तर बहुत अच्छा नहीं है। स्वच्छता भी उच्च स्तरीय नहीं है। उन्हें बीमारियां पकड़ लेती हैं। ग्रेडिंग प्रणाली में फेल होने की धमकी ज्यादा, प्रोत्साहन कम है।
मौका आरोप-प्रत्यारोप का तो कतई नहीं है। छात्रों व शिक्षकों, दोनों को सोचना होगा कि ये स्थितियां क्यों पैदा हुई हैं। आईआईटी या अन्य प्रीमियर शिक्षा संस्थानों के आंतरिक हालातों पर गौर करें तो पता चलता है कि तमाम छात्र-छात्राएं तो हफ्ते-हफ्ते नहीं नहाते। इंटरनेट की व्यस्तता व पढ़ाई के भूत से परेशान बड़ी संख्या में छात्र रात तीन बजे तक नहीं सोते और सुबह कक्षा में पहुंचने के लिए स्नान के साथ नाश्ता तक छोड़ देते हैं। ऐसे छात्रों की बड़ी संख्या है जो सात से दस दिन तक नहीं सोते। पहले शिक्षकों के पास छात्र-छात्राओं के लिए समय होता था किन्तु अब उनकी अपनी व्यस्तताएं हैं। निदेशक सहित अधिकांश विभागाध्यक्ष व प्रमुख शिक्षक प्राय: संस्थान से बाहर रहते हैं, उनके पास छात्रों व शिक्षकों की समस्याएं सुलझाने का समय ही नहीं है। उन्हें तमाम राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार तो मिलते हैं, किन्तु छात्र-छात्राओं के लिए समय नहीं मिलता। यह स्थिति निश्चित रूप से दुर्भाग्यपूर्ण है, किन्तु दुख, एक बार फिर माधुरी की मौत की जांच होगी, जांच समिति अपनी रिपोर्ट देगी किन्तु कार्रवाई हर बार की तरह इस बार भी नहीं होगी।

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29 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yamunapathak के द्वारा
July 15, 2012

शिक्षकों की असंवेदनशीलता और छात्रों की प्रकृति के विरुध जीवन जीने की घातक परिणति

alpana mishra के द्वारा
November 22, 2010

apne jivan ko khatm karne ki baat sochna bhi bahut kathin hota hai fr khatm ka lena bahut mushkil hota hoga…….us insaan par kitna pressure hoga kis baat ka pressure hoga is baat ko shayad koi ni jan pata….siway uske jisne jaan di. mudde to bahut hain bahut the jin par vichar karna chahiye par sabse jyada jaroorat hai har insan ko apni insaniyat banaye rakhne ki. fir chahe teachers hon ya parents ya students. ghar me bhi bachchon ko itna apnapan milna chahiye ki apni problems share ker saken.

    Sanjiv Mishra, Jagran के द्वारा
    November 22, 2010

    सच है, अपनापन शेयर करने का मौका मिले तो तमाम समस्याओं का हल स्वयमेव हो जाए।

Dharmesh Tiwari के द्वारा
November 22, 2010

आदरणीय मिश्रा जी सादर प्रणाम………………..बढ़ रहे आत्म हत्या के केशों को कैसे रोका जाय इस पर विचार करना अति आवश्यक है,आपने इस लेख के द्वारा पहल की,धन्यवाद!

    Sanjiv Mishra, Jagran के द्वारा
    November 22, 2010

    हम सब मिलकर इस मुहिम को आंदोलन में बदलने में सफल होंगे

Zafar Irshad के द्वारा
November 21, 2010

संजीव…५ सालों में ८ स्टुडेंट्स की आत्महत्या एक बहुत बड़ी बात है इससे इस संसथान की साख को गहरा धक्का लगा है .इसके लिए हम मीडिया वाले लोग भी कही न कही ज़िम्मेदार है आखिर हम उनकी छोटी से छोटी सफलताओं को पहले पन्ने पर उनके फोटो के साथ क्यों छापते है क्यों उनकी कमियों को धिक्कारते नहीं है, हमारी कलम को उन्होंने तो खरीद तो लिया नहीं है हम तो नहीं छापते की वोह चाँद पर जा रहे है या वोह दुनिया के नंबर १ संसथान है.. आप के शब्दों में हम ऐसा इसलिए नहीं करते क्यौकी हमें वहां पढने का मौका नहीं मिला और हम उनकी कामिया निकल कर अपनी खीज मिटा रहे है कल तक इस संसथान की हर गलत बात को समर्थन देने वाले और हमसे इस पर घंटो बहस करने वाले आप आज इस के खिलाफ क्यों हो गए यह भी एक सोचने की बात है….

    Sanjiv Mishra, Jagran के द्वारा
    November 22, 2010

    कलम तो कोई नहीं खरीद सकता, जब तक वह बिकाऊ न हो

sanjay rustagi के द्वारा
November 20, 2010

संजीव जी, छात्रों की इस गंभीर समस्या पर दृष्टि डालकर आपने सरकार, अभिभावकों व शिक्षण संस्थान को मंथन करने को मजबूर कर दिया है। इसपर सार्वजनिक बहस की भी जरूरत है। ज्वलंत मुद्दा उठाने के लिए आपको

    Sanjiv Mishra, Jagran के द्वारा
    November 20, 2010

    संजय़ जी, निश्चित रूप से सार्वजनिक चर्चा व बहस से ही समस्या के स्थायी समाधान को खोजा जा सकेगा। 

mrigank pandey के द्वारा
November 20, 2010

संजीव जी, आपने सही समस्या को उठाया है। इसपर गंभीर मंथन की आवश्यकता है। पोस्ट के लिए बधाई।

    Sanjiv Mishra, Jagran के द्वारा
    November 20, 2010

    धन्यवाद मृगांक जी, इस समस्या के समाधान को एक मुहिम चलाने की जरूरत है… मुझे लगता है हम सब मिलकर इस दिशा में सफलता पाएंगे।

Manish Tripathi के द्वारा
November 20, 2010

संजीव जी समस्या आईआईटी नहीं है, समस्या है विलक्षणता का वह लेबल जो हम मेधावी बच्चों पर चिपका देते हैं, उनकी तमाम संभावनाओं को ढंकते हुए। अब हर कोई तो अरविंद गुप्ता नहीं हो सकता जो आईआईटी में पढ़ाई पूरी करके आदिवासियों के बीच जंगल में चला जाए… टूटी चीजों से वैज्ञानिक खिलौने बनाने में आनंद तलाश ले और परिवार भी उसका साथ दे। आल इज वेल का बालीवुडिया जयघोष जिंदगी के नक्कारखाने में तूती है। आपसे बेहतर कौन जानता होगा कि आत्महत्या का सांप आईआईटी के छात्र-छात्राओं को ही नहीं, कक्षा चार-पाँच के बच्चों को भी डंसने लगा है। हर आत्महत्या एक करुण पुकार है इसे सुनिए…हर मरने वाला कहता है मुझे जी लेने दो…पर हम अपनी उम्मीदों के तकिए से उसका मुँह दबा देते हैं…क्यों….ताकि उस गरीब के सुनहरे भविष्य के सपने में अपना नाम चढ जाए…जब तक अभिभावक मेरा नाम करेगा रोशन का राग नहीं छोड़ेंगे…तैंतीस करोड़ सुसाइड काउंसलर भी इस देश का भला नहीं कर सकते….

    Sanjiv Mishra, Jagran के द्वारा
    November 20, 2010

    मनीष जी, विचारोत्तेजक प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद… हम सबको इस दिशा में मिलकर पहल करनी होगी। 

Richa के द्वारा
November 20, 2010

I fully appreciate this stunningly written article, definitely an initiative taken like does not only draw attention to improve the student teacher relationship but will also bring attentiveness to parents to recognize the stress their teenagers might be going through. Hopefully with a joint effort of the education system, families and the media we can sidestep losing some of the young talent who are very much needed to pull our country from developing to a developed nation. Kudos to the initiative.

    Sanjiv Mishra, Jagran के द्वारा
    November 20, 2010

    Thanks Richa… we have to fight for this

ashvinikumar के द्वारा
November 20, 2010

प्रिय मिश्रा जी बहुत ही सार्थक मुद्दा उठाया है आपने,इसके की मनोवैज्ञानिक पहलू हैं ,विश्वद्यालय प्रशाशन को स्वयं को परिष्करण एवं चिंतन की अत्याधिक आवश्यता है ,इसका एक कारण विद्यार्थियों एवं शिक्षकों की आपसी खेमाबंदी ,गुरू शिष्य परम्परा के विचार को तो कब का त्यागा जा चुका है ,अब शिक्ष्ण संस्थाओं में भी माफिया राज व्याप्त हो गया है जिसे कूछ विद्यार्थियों का समर्थन भी प्राप्त है जिससे अनावश्यक केवल अध्ययन में विश्वाश करने वाले छात्रों को प्रताड़ना का शिकार होना पड़ता है की ऐसे कारण है जिससे छात्रों में विक्षोभ जन्म लेता है जिसकी कभी कभी परिणति इस रूप में भी हमारे सामने आ जाती है …………………जय भारत

    Sanjiv Mishra, Jagran के द्वारा
    November 20, 2010

    इसी विक्षोभ से मुक्ति का संघर्ष आईआईटी को करना होगा….। वैचारिक सहयोग के लिए आपका धन्यवाद। 

ashutosh के द्वारा
November 20, 2010

बहुत अच्छा लिखा आपने संजीव जी असल में आज के प्रगतिशील समाज में विद्यार्थियों के साथ साथ शिक्षको पर भी दबाव बढता जा रहा दोनों की जरूरतों का दायरा बढ़ता जा रहा है जिससे दोनों के बीच दूरियां बढ़ी है कुछ हद तक इन्टरनेट ने भी शिक्षकों से मिलने और सलाह लेने की जरुरत को कम किया है महतवपूर्ण मुद्दा है हल निकालना आवयशक है उम्मीद करतें है शिक्षण संसथान इन पर कोई सकारात्मक पहल करेंगी युवाओं का इस तरह के कदम उठाना ठीक नहीं आशुतोष दा

    Sanjiv Mishra, Jagran के द्वारा
    November 20, 2010

    धन्यवाद आशुतोष जी, वैसे उम्मीद है कि हम सब मिलकर आईआईटी प्रबंधन को इन आत्महत्याओं से बचने का रास्ता ढूंढ़ने पर विवश कर देंगे। 

हिमान्शु मोहन के द्वारा
November 20, 2010

बहुत सार्थक पोस्ट है, विचारोत्तेजक भी और प्रतिक्रियाओं को कुरेदती सी। तुरन्त ही कुछ कहने और सहमत होने की स्थिति बनती है, और ज़रूरत महसूस होती है अपने विचार शेयर करने की। मुझे लगता है कि १- बढ़ती हुई प्रतिद्वन्दिता से जन्मती स्ट्रेस के नए आयाम, २- ज़्यादातर आई-आई-टी की फ़ैकल्टी का छात्रों के स्तर की अपेक्षा दोयम दर्ज़े का होना, ३- अपनी कुण्ठाओं को शान्त करने के लिए अपने छात्रों-छात्राओं को कठिन से कठिन मूल्यांकन का स्तर लागू करना, ४-अपने को जो कठिनाई हुई किसी विषय विशेष में, उससे छात्रों को भी दो-चार करना ये ऐसी ख़ामियाँ हैं जो आई-आई-टी ही नहीं, पूरी शिक्षा-व्यवस्था में देखने को मिल रही हैं। असर आई-आई-टी में इसलिये अधिक नज़र आता है कि एक तो उच्चतम स्तर के संस्थान होने से हम सबकी नज़र में ये ज़्यादा रहते हैं, दू्सरे यहाँ प्रवेश पाने वाले छात्र भी सबसे ज़्यादा प्रतिस्पर्द्धी भावना के, उच्चतम उपलब्धियों के प्रति उन्मुख और चेष्टावान, और इसी से अपने को शारीरिक और मानसिक श्रम की पराकाष्ठा तक “पेर” डालने को आतुर होते हैं। इस पीढ़ी को कोई यह नहीं समझा पा रहा कि ये उपलब्धियाँ जीवन की पूरी कहानी के कुछ अध्याय मात्र हैं, और जीवन इन उपलब्धियों के लिये नहीं, ये उपलब्धियाँ जीवन को बेहतर बनाने के लिए हैं। यही वजह है कि हम एक के बाद एक आई-आई-टी की फ़ैक्ट्री से “चतुर रामलिंगम” जैसे पुर्ज़े बनाते चले जा रहे हैं, बजाय धारदार मस्तिष्क के। यकीनन सब लोग ऐसे ही नहीं हैं, वो फ़ैकल्टी जो अपने रिसर्च आदि से पार हो चुके हैं उनके निहित स्वार्थ भी कम होंगे – ऐसा लगता है, मगर यह पर्याप्त नहीं है कि बड़ी उम्र की फ़ैकल्टी की ही हिमायत की जाए। अच्छे छात्रो को अपने दामाद-बहू बनाने या अन्य स्वरूपों में उनसे अपने स्वार्थ का दोहन होता रहा है और होता रहेगा, क्योंकि यह मानव-स्वभाव की निहित कमज़ोरी है। बस इतना ही काफ़ी है कि यह सीमा में रहे।

    Sanjiv Mishra, Jagran के द्वारा
    November 20, 2010

    धन्यवाद, आपने बिल्कुल सही मुद्दे की ओर ध्यान आकृष्ट किया है। आईआईटी में मूल रूप से चतुर रामलिंगम ही तैयार हो रहे हैं…. जबकि समाज को जरूरत ईडियट्स की है… चतुर बनने की लालसा ही बच्चों को आत्महत्या की ओर प्रेरित करती है।

deepu kumar के द्वारा
November 20, 2010

ये आपकी पहेल छात्रों के लिए कुछ हद तक सुखदाई होगी ! मुझे बहुत पसंद आया !

Arpit Gupta के द्वारा
November 20, 2010

How disgusting…. One more suicide case reported at one of the most reputed technical institutes of India: Indian Institute of Technology / Kanpur. IIT/K authorities told Madhuri’s (the deceased girl) family members that she was academically weak and depressed because of her poor performance hence committed suicide however according to her mother she was little bit worried about her future but certainly she was a courageous and brilliant in studies and she could never go with ending her life even if she is not doing well. I request Mr Sanjay G Dhande, Director IIT/K to go through with the article written by honourable Mr Sanjiv Mishra, Deputy News Editor, Dainik Jagran Group Kanpur who tried to draw attention of public towards genuine problems of IITians. Why techies are frequently tend to commit suicide and why action committies remain mute spectator and don’t take appropriate action in this regard, as 10 similar cases were reported within past five years. Think..?????

    Sanjiv Mishra, Jagran के द्वारा
    November 20, 2010

    धन्यवाद अर्पित… हम सब कोशिश करें ताकि यह सिलसिला कहीं तो थमे। 

mahesh sharma के द्वारा
November 20, 2010

आदरणीय भैय्या, आईआईटी की व्यवस्था में कोई न कोई ऐसी व्यवस्थागत खामी जरूर है, जिसके चलते ऐसी घटनाओं की  पुनरावृत्ति हो रही है। आपने संभावित कारणों का सूक्ष्म विवेचन किया है। इसके लिए बधाई। केंद्रीय मानव  संसाधन मंत्रालय और आईआईटी प्रबंधन संवेदनशीलता दर्शा आत्महत्या कर रही मेधाओं का जीवन बचाने की सार्थक पहल करे, ऐसी अपेक्षा है।

    Sanjiv Mishra, Jagran के द्वारा
    November 20, 2010

    सही कह रहे हो, लेकिन आईआईटी शिक्षकों को अपने आप से फुर्सत मिले, तब तो वे बच्चों की चिंता करें। 

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
November 19, 2010

शिक्षक, छात्रों का दुख-दर्द न सुनना। शिक्षक और छात्रों के बीच दूरियां or छात्रों में घटता स्वअनुशासन के अतिरिक्त शिक्षकों मे संवेदना की कमी ओर छात्रों पर दवाब डालने की प्रवृति………… मुख्य कारण हैं…….।………………..सार्थक लेख के लिए हार्दिक बधाई……….

    Sanjiv Mishra, Jagran के द्वारा
    November 20, 2010

    धन्यवाद पीयूष जी, इससे आईआईटी के दुखी छात्र-छात्राओं का मनोबल बढ़ेगा और मुझे विश्वास है कि शिक्षक भी आत्महत्याओं पर नियंत्रण की सार्थक कोशिश जरूर करेंगे। 


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